कैसे बढ़े चौकसी, दूसरे जिलों में रह कर रहे ड्यूटी जिम्मेदार

 


बाराबंकी। अब इससे बड़ी त्रादसी और क्या होगी कि जिम्मेदारी की जगह पर मोटी पगार लील रहे जिम्मेदार जिले में रात्रिनिवास करते ही नहीं है इधर आए नहीं ड्यूटी कि वापसी की तैयारियों में कोरम तक पूरा करना मात्र कागजी आंकड़ों में ही पूरा हो पाता है।


अब इन छोटे अधिकारियों पर अंकुश लगाने में नैतिक रूप से बड़े अधिकारी भी कतराते सिर्फ इसलिए हैं कि ज्यादातर वह भी अपने लखनऊ राजधानी स्थित निवास में ही रात्रि को निकल जाते हैं और सुबह आफिस टाइम पर ही वापस लौटते हैं। यही नहीं बढ़ रही टेक्नॉलाजी भी इनके रूआब के आगे धाराशायी सिर्फ इसलिए है कि शायद पुराना गाना याद हो ''-- मै तो साहब बन गया साहब बनकर कैसा तन गया------'' अब साहब अगर आमजन या छुटभैईए यानी गैरव्यवसायिक यानी सत्य की कलम थामे पत्रकारों से कैसे बात भी कर लें उनकी साख नहीं कम हो जाएगी कि अरे डीएम साहब ने सीधे फोन उठा लिया एसपी साहब ने सीधे फोन उठा लिया? भले ही इनकी डयूटी वा पद वास्तविकता में सरकारी नौकर बनाम नौकर शाह का हो और दायित्व भी? लेकिन कहते हैं ना कि अंग्रेज चले गए लेकिन अंग्रेजी छोड़ गए गुलामी की याद बरकरार रखने के लिए।


वैसे सूत्रों की मानें तो सामने आए मामले में जिसमें एसपी ने अभी पासपोर्ट मामले में एक पुलिस कर्मी को निलंबित किया है उससे कहीं ज्यादा संजीदा अपराध तो एलआईयू वाले अधिकारी अंजाम दे रहे हैं वो भी शासनादेश को दरकिनार करते हुए। बताते चलें कि पूर्व एसपी वीपी श्रीवास्तव के समय में आतंकवादी का पासपोर्ट बनने वाले मामला सुर्खियों में आया तो विभाग ने आमजन से पैसे ऐठनें का नया पैतरा एलआईयू की अलग से जांच शासनादेश को दरकिनार करते हुए करवाने का फैसला कर लिया। जो सूत्रों की मानें तो यहां के विभागीय अधिकारी ने इनके बाद आए एसपी को भी अपने विश्वास में रखकर ऐनकेन प्रकारेण जारी रखा। इसमें किसी ने ना नुकूर की तो एसपी से उसकी झूठी शिकायत तक करके निलंबित तक करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई कि किसी दूसरे की आवाज न बुलंद हो पाए। लेकिन जहां ड्यूटी निभाने की बात हो, किसी सिडींकेट के पैर जमाने गैरकानूनी कार्य को अंजाम देने की बात हो तो यह विभाग कुंभकरणी नींद सोते रहने में सबसे आगे रहने वाला विभाग बन गया है।


अब जहां तक विभाग को चूना लगाने की बात है तो सूत्रों की मानें तो जनता की सजगता के लिए मिलने वाला पेट्रौल तक लखनऊ स्थित घर से रोज आनेजाने में व निजी ऐशोआराम में निजी वाहन में ही अर्से से भरवाया जा रहा है। लेकिन मजाल है जो कोई पूछ तक लें? यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो पुलिस प्रशासन गुप्तचर विभाग सभी का एकसूत्र कार्यक्रम सरकारी धन का ज्यादा से ज्यादा आहरण व निजसुख हितार्थ काम, बस इतना ही शेष है। अब ऐसे में जनपद में कानून व्यवस्था सुरक्षा कैसे संभव रह सकती है यह विचारणीय है, चाहे आज या फिर कोई बड़ी विडम्बना सामने पेश आने के बाद जब सरकारी कुभंकरणों की आत्मा जागे, तब


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