प्रशासनिक अधिकारी बैठे बेकार, डॉक्टर संभाल रहे प्रशासन का कार्यभार
उप्र लोक सेवा आयोग से स्वास्थ्य विभाग के लिए चयनित जिला प्रशासनिक अधिकारियों को सीएमओ काम नहीं देते हैं। नतीजतन वे बेकार बैठे हैं। इसलिए इस संवर्ग का कोई अधिकारी स्वास्थ्य विभाग में अब जॉइन नहीं करना चाहता है। वर्तमान में इस संवर्ग में लगभग 25 जिला प्रशासनिक अधिकारी बचे हैं। वहीं, अस्पतालों में इलाज करने वाले डॉक्टरों को सीएमओ ऑफिस में एसीएमओ, डिप्टी सीएमओ के रूप तैनात किया जा रहा है।

बता दें, जिला प्रशासनिक अधिकारी पद का सृजन मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के बढ़ते हुए कार्य व उत्तरदायित्वों के मद्देनजर किया गया था कि वे वित्तीय व प्रशासनिक कार्यों से परेशान न हों और चिकित्सा स्वास्थ्य व परिवार कल्याण संबंधी दायित्वों को अधिक समय दे सकें। 


बाद में जिला प्रशासनिक अधिकारियों को सीएमओ कार्यालय के अंतर्गत आने वाले कार्मिकों के वेतन-भत्ते और सभी प्रकार के आकस्मिक खर्चों आदि के लिए आहरण वितरण अधिकारी भी घोषित किया गया था। यहां तक कि वर्ष 2008 में जिला प्रशासनिक अधिकारियों को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत द्वितीय हस्ताक्षरकर्ता का भी अधिकार दिया गया था। मगर इन्हें शासनादेश और पद के अनुसार जिम्मेदारियां नहीं मिलीं।
 संवर्ग के अधिकारियों ने बताया कि जिला प्रशासनिक अधिकारी (परिवार कल्याण) का चयन सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा के माध्यम से होता है। इस पद पर चयन के लिए अनिवार्य शैक्षिक अर्हता पोस्ट ग्रेजुएशन है। 

जबकि अन्य पीसीएस के लिए भी सिर्फ ग्रेजुएशन ही शैक्षिक अर्हता होती है। यही नहीं, जिला स्तर पर स्थापित जिला परिवार नियोजन ब्यूरो के अंतर्गत सृजित जिला प्रशासनिक अधिकारी का पद डिप्टी कलेक्टर/तहसीलदार के समकक्ष है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे में जब प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए अलग संवर्ग बनाने पर विचार चल रहा है तो पहले से मौजूद अधिकारियों से कार्य लिया जाए।
सीएमओ ऑफिस में फाइनेंस ऑफिसर वित्त से जुड़े कार्य करते हैं। जिला प्रशासनिक अधिकारी के लिए जो भी कार्य निर्धारित हैं, उन्हें दिए जाते हैं। 
-डॉ. पद्माकर सिंह, महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य