खजुराहो की नग्न मूर्तियों को नष्ट कराना चाहते थे राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, कहा करते थे ये बात...
राजनीतिक जगत के ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक संसार के भी महत्वपूर्ण व्यक्ति थे राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन। बचपन से ही सत्संग के प्रति उनका विशेष लगाव था। सूफी साहित्य का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया था। देवरहा बाबा ने उन्हें 'राजर्षि' की उपाधि प्रदान की थी। वैसे तो राजनीति में छल-कपट सब मान्य है, पर वह कहते थे राजनीति में सत्य का बड़ा महत्व है।

शायद यही वजह रही कि राजनीति में वह जहां रहे वहां सत्य की स्थापना का ही प्रयास किया और अपने को इस दुनिया की गंदगी और कीचड़ से अलग रखा। डॉ. अगम प्रसाद माथुर ने संस्मरण में लिखा है, 'राजर्षि टंडन सिनेमाघरों में प्रदर्शित अश्लील फिल्मों और अर्धनग्न चित्रों के प्रकाशन के घोर विरोधी थे।अखिल भारतीय संस्कृति सम्मेलन' के अधिवेशन में रखा प्रस्ताववह इसे भारतीय संस्कृति की मर्यादाओं के विरुद्ध मानते थे। वर्ष 1955 में 'अखिल भारतीय संस्कृति सम्मेलन' के अधिवेशन में उन्होंने इस सिलसिले में एक प्रस्ताव भी रखा। प्रस्ताव में कहा गया था, 'अर्धनग्न चित्रों के प्रकाशन और अश्लील फिल्मों के प्रदर्शन पर शासन को रोक लगा देनी चाहिए।यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है।' सम्मेलन ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित भी कर दिया। राजर्षि टंडन खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों की दीवारों पर खुदी नग्न मूर्तियों को भी नष्ट कराना चाहते थे। वह कहा करते थे, 'यह मूर्तियां किसी भी तरह भारतीय संस्कृति की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं।'