आरबीआई से मिले पैसों से मिलेगी मंदी से जूझती अर्थव्यवस्था को मदद

सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकार को अपने खजाने से 1.76 लाख करोड़ रुपये देने का एलान कर दिया। आरबीआई ने बिमल जालान समिति की सिफारिश को मानते हुए यह फैसला लिया है। 84 साल के इतिहास में आरबीआई पहली बार इतनी ज्यादा पैसा सरकार को तीन से पांच साल में देगा। जानकारों का मानना है कि इससे मंदी से जूझती अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद मिलेगी। 


जीडीपी का एक फीसदी फंड


जो पैसा सरकार को आरबीआई से मिलेगा, वो देश की अर्थव्यवस्था का एक फीसदी है। कार्वी के रिसर्च हेड और उपाध्यक्ष डा. रवि सिंह ने बताया कि इस पैसे की मदद से सरकार कई सेक्टर में जान फूंकने का काम करेगी। सरकारी बैंकों को तो पैसा मिलेगा ही, वहीं ऑटो, रियल इस्टेट, इंफ्रा, एमएसएमई आदि सेक्टर को बूस्ट करने में भी मदद मिलेगी। 2015 में आरबीआई से सरकार को 65896 करोड़ रुपये, 2016 में 65876 करोड़ रुपये, 2017 में 30659 करोड़ रुपये, 2018 में 50 हजार करोड़ रुपये मिले थे। 


सरकार ने रखा था 90 हजार करोड़ का लक्ष्य


सरकार ने इस साल के बजट में आरबीआई से 90 हजार करोड़ रुपये मिलने का लक्ष्य रखा था। हालांकि अब जालान समिति के अनुशंषा पर सरकार को 86000 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिलेंगे। मंदी के चलते इस बार अर्थव्यवस्था काफी कमजोरी दिखा रही है। ऐसे में सरकार की आय पर भी इसका असर पड़ने की संभावना है। सरकार की आय में जो भी असर पड़ेगा उसकी भरपाई इसके द्वारा की जाएगी। सरप्लस ट्रांसफर किए जाने से केंद्र सरकार के पास अतिरिक्त पैसा आएगा, जिससे सरकार को सार्वजनिक लोन चुकाने और बैंकों में पूंजी डालने में मदद मिलेगी। इससे बाजार में बड़ी तादात में पैसा आएगा और डिमांड बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।


तीन से पांच साल में मिलेगा पैसा


यह पैसा सरकार को आरबीआई से तीन से पांच साल के बीच में मिलेगा। कॉन्टिजेंसी फंड, करेंसी तथा गोल्ड रवैल्यूएशन अकाउंट को मिलाकर आरबीआई के पास 9.2 लाख करोड़ रुपये का रिजर्व है, जो केंद्रीय बैंक के टोटल बैलेंस शीट साइज का 25 फीसदी है।


पिछले पांच साल में सबसे कमजोर तिमाही


इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानि की अप्रैल से जून के समय को पिछले पांच सालों का सबसे कमजोर तिमाही माना जा रहा है। इस तिमाही में जहां निवेश घटा, वहीं मांग में भी कमी देखने को मिल रही है। साल दर साल के आधार पर इस तिमाही में अर्थव्यवस्था के 5.7 फीसदी की रफ्तार से विकास करेगी। शुक्रवार को सरकार जीडीपी डाटा को शाम 5.30 बजे जारी करेगी। 


बहुत सारे क्षेत्रों में आई हुई है मंदी


मंदी का असर अब देश के चार बड़े उद्योगों पर दिखने लगा है। बिस्किट, अंडरगार्मेंट्स, बाइक और शराब की खपत में बहुत ज्यादा गिरावट देखने को मिल रही है। ऐसे में पता चल रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा की और जा रही है। खपत न होने से कंपनियों ने भी उत्पादन को कम कर दिया है, जिससे हालत अब यह हो गए हैं, कि कंपनियों को खर्चा निकालने के लिए कर्मचारियों को भी बाहर का रास्ता दिखाना पड़ रहा है। 


सरकार ने किया था राहत देने का एलान


हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उद्योग के साथ ही आम लोगों को भी राहत देने का एलान किया था। इसमें ऑटो सेक्टर, एमएसएमई और आम जनता शामिल थी। सीतारमण ने अर्थव्यवस्था में व्याप्त मंदी को दरकिनार करते हुए कहा कि आर्थिक सुधार पर सरकार लगातार काम कर रही है। इसके साथ ही पूरी दुनिया में इस वक्त मंदी का माहौल छाया हुआ है, लेकिन भारत में इसका असर नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों से कैपिटल गेन्स टैक्स वापस लेने की घोषणा कर दी है। 


बेरोजगारी दर बढ़ी


मंदी के बीच देश में बेरोजगारी दर पिछले तीन साल के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। वहीं देश के तीन राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा खतरनाक हो गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) ने इस बात का खुलासा अपनी एक रिपोर्ट में किया है। 20 अगस्त तक बेरोजगारी दर 8.3 फीसदी हो गई, जोकि पिछले तीन सालों में अभी तक का सबसे उच्चतम स्तर है। सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक देश के तीन राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। त्रिपुरा, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में लोगों को नौकरियां ढूंढने पर भी नहीं मिल रही हैं। त्रिपुरा में बेरोजगारी दर 23.3 फीसदी रिकॉर्ड की गई है।