आखिर क्यों सरकार ने RBI से लिए 1.76 लाख करोड़ रुपये

भारतीय रिजर्व बैंक ने मोदी सरकार को 24.8 अरब डॉलर लाभांश और सरप्लस पूंजी के तौर पर देने का फैसला किया है। दावा किया जा रहा है कि इससे मोदी सरकार को सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों की नाजुक हालत को ठीक करने में मदद मिलेगीलेकिन इसके साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्तता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। पिछले साल आरबीआई के तत्तकालीन गवर्नर उर्जित पटेल और मोदी सरकार में नीतिगत स्तर पर असहमतियां सामने आई थीं और पटेल ने कार्यकाल खत्म होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया थाकनाडा की कार्लटन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर विवेक दहेजिया ने आरबीआई के इस फैसले पर फाइनेंशियल टाइम्स से कहा, ''केंद्रीय बैंक अपनी कार्यकारी स्वायत्तता खो रहा है और सरकार के लालच को पूरा करने का जरिया बनता जा रहा है।'' विवेक दहेजिया की आरबीआई की गतिविधियों पर नजर बनी रहती है।
उन्होंने कहा, ''इसे रिजर्व बैंक की विश्वसनीयता कमजोर होगी। जो निवेशक भारत की तरफ देख रहे हैं वो कहेंगे कि आरबीआई पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। मुझे नहीं लगता कि यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है।''
सोमवार को एक बयान जारी कर आरबीआई ने कहा कि पिछले वित्तीय वर्ष में हुई कुल आय 17.3 अरब डॉलर और 7.4 अरब डॉलर की सरप्लस राशि वो सरकार को सौंपने जा रहा है। रिजर्व बैंक ने कहा कि यह ट्रांसफर न्यू इकनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के तहत है जिसे हाल ही में स्वीकार किया गया है।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी और इसी समिति ने न्यू इकनॉमिक फ्रेमवर्क की सिफारिश की थी। इस समिति की सिफारिशों को आरबीआई ने स्वीकार कर लिया है। आरबीआई इस बात पर सहमत हो गया है कि वो पिछले वित्तीय वर्ष की पूरी आय सरकार को दे देगा। रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित पैसे के इस्तेमाल को लेकर पिछले साल अक्टूबर में ही विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी।
आरबीआई के तत्कालीन उप गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार को चेताया था कि सरकार ने आरबीआई में नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप बढ़ाया तो इसके बहुत बुरे नतीजे होंगे। विरल आचार्य ने कहा था कि सरकार आरबीआई के पास सुरक्षित पैसे को हासिल करना चाहती है।
इसके दो महीने बाद ही उर्जित पटेल ने आरबीआई से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद मोदी सरकार ने शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाया।
शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाए जाने पर बीबीसी संवाददाता दिलनवाज पाशा से अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने कहा, ''जिस दिन शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर बने उसी दिन साफ हो गया था कि सरकार जो चाहेगी उसे आरबीआई को करना होगा।''
ठाकुरता कहते हैं, ''शक्तिकांत दास आईएएस अधिकारी रहे हैं और वो वित्त मंत्रलाय में प्रवक्ता के तौर पर काम करते थे। जब नोटबंदी हुई तो दास ने समर्थन किया था। शक्तिकांत दास दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ रहे थे। दास ने सरकारी अधिकारी के तौर पर काम किया है। रिजर्व बैंक के पास पैसे का होना बहुत जरूरी है क्योंकि विदेशी मार्केट में कुछ होगा तो रुपया और कमजोर होगा। सरकार के आंकड़े पहले से ही संदिग्ध हैं। इस बात को मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार भी उठा चुके हैं।''
भारतीय अर्थव्यवस्था में आई कमजोरी से सरकार दबाव में है। भारतीय मुद्रा रुपया अमरीकी डॉलर की तुलना में 72 के पार चला गया है। लगातार चौथे तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर में गति नहीं आ पाई है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि क्या मोदी आरबीआई से पैसे लेकर अर्थव्यवस्था में मजबूती ला पाएंगे। सरकार ने टैक्स कलेक्शन का जो लक्ष्य रखा था उसे पाने में नाकाम रही है।
आरबीआई हर साल सरकार को निवेश से हुई अपनी आय और नोटों की प्रिंटिंग के आधार पर सरकार को लाभांश देता है। पिछले कुछ सालों से वित्त मंत्रालय आरबीआई से बड़ा भुगतान चाह रहा था। रिजर्व बैंक का कहना है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा पैसे हैं इसलिए सरकार को इतनी बड़ी रकम दी है। कहा जाता है कि इसी को लेकर पूर्व आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और सरकार के बीच विवाद की स्थिति बनी थी।
विमल जालान समिति ने सिफारिश की थी कि आरबीआई के पास अपनी बैलेंसशीट के 5.5 से 6.5 फीसदी रकम होनी चाहिए। इससे पहले यह राशि 6.8 फीसदी थी। सरकार का लक्ष्य है कि 2020 बजट घाटा जीडीपी का 3.3 फीसदी किया जाए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते ही कहा था कि सरकार जल्द ही 700 अरब रुपये सरकारी बैंकों में डालेगी। एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत का बैंकिंग सेक्टर संकट के दौर के गुजर रहा है। विरल आचार्य आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के रूप में 26 अक्तूबर, 2018 को चर्चा में आए थे जब उन्होंने आरबीआई की स्वायत्तता से समझौता करने का आरोप लगाते हुए मोदी सरकार को खरी-खोटी सुनाई थी। उनका ये भाषण रिजर्व बैंक की बोर्ड बैठक के ठीक तीन दिन बाद हुआ था।
अपने करीब डेढ़ घंटे के भाषण में तब उन्होंने कहा था कि जो सरकारें अपने केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता का सम्मान नहीं करतीं, उन्हें देर-सबेर वित्तीय बाजारों के गुस्से का सामना करना ही पड़ता है। आचार्य के उस संबोधन को आरबीआई और मोदी सरकार के बीच के रिश्तों में तल्खी के रूप में देखा गया था।
दरअसल, इस भाषण से कुछ समय पहले सरकार और रिजर्व बैंक के बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे। मसलन सरकार ब्याज दरों में कमी चाहती थी, गैरबैंकिंग फाइनेंस कंपनियों यानी एनबीएफसी को और अधिक नकदी देने की हिमायत कर रही थी, साथ ही सरकार ये भी चाहती थी कि आरबीआई अपने रिजर्व का कुछ हिस्सा सरकार को दे।